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Saturday, January 02, 2010

ऐवा का भूत........

अंग्रेज अधिकारी की बीवी देखने में बहुत खूबसूरत थी... ऐसा हमने सुना था। और उसी ऐवा के लिए उस अधिकारी ने बनाया था ऐवा लॉज। और इसी ऐवालॉज में हम रहते थे...। मैंने शिमला यूनिवर्सिटी में कदम ही रखा था...। बरसात का महीना था... मुझे एक नम्बर कमरा मिल चुका था...। दरअसल हमरे यहां भूत बरसात और सर्दियों के मौसम में ख़ासे एक्टिव रहते हैं...। बरसात में इस लिए क्योंकि शिमला में बरसात के दिनों में खूब धुंध पड़ती है और रात के अंधेरे में रोशनी के बीच यही धुंध कुछ डरावनी भी लगती है...।

एक दिन मैं हॉस्टल में हीटर के पास अपने कुछ सीनियर्स के साथ बैठा था...। देश की राजनीति पर चर्चा चल रही थी...। वक्त करीब रात के दो बजे के आसपास रहा होगा....। हॉस्टल के कुछ छात्र भागते हुए आए और कहने लगे कि उन्होंने सफेद कपड़ों में ऐवा को देखा...। दरअसल सालों से ये किस्सा हॉस्टल में चल रहा था कि ऐवा की आत्मा यहां आती है..। बस फिर क्या था, एक बार फिर शुरु हुआ ऐवा के किस्सों का दौर...। कई किस्से सुने...। मैं उन दिनों एमबीए फर्स्ट समेस्टर में पढ़ता था..। सुबह यूनिवर्सिटी आया और अपनी क्लास की लड़कियों को ऐवा के नाम पर खूब डराया..।

धीऱे-धीरे हमने ऐवा के भूत को चर्चाओं में इस कदर जगा दिया कि शनिवार के दिन एक जाने-माने अंग्रेज़ी अख़बार के पत्रकार महोदय यहां पहुंच गए...। फिर क्या था हॉस्टल का हर छात्र बोल पड़ा हमने भी ऐवा को देखा है...। बस, एक हफ्ते बाद रविवार के दिन उस अंगेजी अख़बार में ऐवा के भूत पर एक स्टोरी छप गई...। हम सब बड़े खुश हुए... लेकिन ऐवा के भूत ने हमें बड़ा फायदा दिया...। हुआ यूं कि हमारा हॉस्टल रिहायशी इलाके के नज़दीक था...। एक सिख परिवार हॉस्टल में मेरे पास आया और उन्होंने कहा कि हमें अखण्ड पाठ करवाना है और इसके लिए चार दिनों तक आपका टीटी रूम चाहिए...। पहले तो मैने मना कर दिया फिर उन्होंने कहा कि पाठ के आखिरी दिन हम डिनर भी देंगें...। तो मैंने तपाक से हां कर दी...। टीटी रूम से टीटी टेबल हटा दिया गया...।

इससे पहले कि पाठ शुरु होता... दूसरे ही दिन ये खबर यूनिवर्सिटी एड्मनिस्ट्रेशन को पता चल गई...। वार्डन साहब को बुलाया गया जिनका हॉस्टल में आना एक तरह से प्रतिबंधित था...। उन्होंने गेंद मेरे पाले में डाल दी....मै अपने कुछ साथियों के साथ चीफ वार्डन के पास पहुंचा....। चीफ वार्डन ने हमें देखकर यही कहा... क्यों मेरी नौकरी के पीछे पड़े हो? हमें बहुत बुरा लगा.. बात वीसी तक पहुंच गई... हमें लगा कि हमारा डिनर भी गया और पड़ोस में जो फजीहत होगी वो अलग...। लेकिन तभी हमें ऐवा के भूत की याद आ गई...। हमने अगले ही दिन एक प्रेस नोट जारी किया कि हॉस्टल में ऐवा का भूत लड़कों को परेशान कर रहा है... इसलिए ऐवालॉज हॉस्टल के छात्र पाठ करवा रहे हैं...। ख़बर अख़बार में छपी और सबके मुहं बंद हो गए....। पाठ खत्म हुआ और ऐवा के भूत की वजह से हमने कई दिनों बाद लजीज़ खाना खाया.......

Wednesday, June 17, 2009

ऐवालॉज की दुनिया

ऐवालॉज की दुनिया में आपका स्वागत है...देखने में ये एक इमारत है जिसे एक अंग्रेज अधिकारी ने अपनी महबूबा ऐवा के लिए बड़े ही प्यार से बनाया था। इसके बाद ये बना हिमाचल के पहले मुख्यमंत्री का निवास... लेकिन बाद में इस ईमारत को यूनिवर्सिटी को दे दिया गया... और मुख्यमंत्री के बाद यहां मेरे जैसे स्टूडेंट रहने लगे... और यहां रहने वाला हर स्टूडेंट अपने आपको सीएम ही समझता था... संयोग से मुझे इस हॉस्टल में कमरा नम्बर एक मिला... जो कभी सूबे के पहले सीएम का बैड रूम था... और बाद में हॉस्टल के मठाधीशों का कमरा हुआ करता था... जैसे ही मैने इस दुनिया में कदम रखा तो मुझे अहसास हो गया कि यहां क्या ख़ास है... दरअसल, इस दुनिया में वो सबकुछ है जो माक्र्स और लोहिया अपनी दुनिया में लाने के लिए संघर्ष करते रहे। यहां सिनियर्स जूनियर्स के बीच खूब प्यार था... और यहां रहने वाले स्टूडेंट इसे हॉस्टल नहीं बल्कि अपना घर ही समझते थे... अब ये न जाने इस इमारत की बनावट की खासियत थी या यहां रहने वालों की... लेकिन यहां जो भी अक्खड़ आता जल्द ही एवालाजियन बन जाता था... एवालाजियन यानी पढ़ाई से लेकर लड़ाई-झगड़े, फालतू के पंगे और जमकर हुल्लड़बाजी करने वाला शख्स... लेकिन साथ ही साथ बेहद संवेदनशील भी... ये सब हमारे सिनियर्स हमें सिखाते थे और हम अपने जूनियर्स को.. यहां रहने वाले तमाम लोग "चीते' हैं... लेकिन एलटीटीई के नहीं बल्कि यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले ...जिन्हें यहां कदम रखते ही ये सिखाया गया कि.....ऐवालाज के चीते हैं, शान से जीते हैं। बस, यही बात दोहराते-दोहराते पता ही नहीं चला कब एमबीए की पढ़ाई पूरी की और फिर पत्रकारिता में एडमिशन ले लिया। इस दुनिया में रहने के लिए रूपए पैसे की भी ज्यादा ज़रूरत नहीं होती थी... जिसकी भी जेब में पैसा होता था उसपर सबका अधिकार होता था। ऐवालॉज की दुनिया में कई बातें अलग होती थीं। मसलन, शिमला की सर्दियों में जब नहाने का मन न हो तो माईकल बाथ ले लो... माईकल हमारे सिनियर थे। वो अक्सर बाल्टी में पानी भर कर नहाने के लिए हॉस्टल के बाथ रूम में जाते थे, लेकिन बाल्टी का सारा पानी बाथरूम की दीवारों पर फेंक कर... आंखों में पानी के छींटे डालकर कांपते हुए और कुछ बड़बड़ाते हुए बाहर आते थे... और वो जनाब महीनों इसी तरह का बाथ लेते थे। खैर, वो तो चले गए, लेकिन हमारे लिए छोड़ गए माईकल बाथ। कहने को तो ये हॉस्टल था लेकिन यहां अक्सर लाल बत्ती वाली गाड़ियां दिखाई देती थी। किसी और की नहीं, एवालॉजियन्स की। दरअसल यहां रहने वाले ज्यादातर स्टूडेंट्स का सपना लाल बत्ती की गाड़ी पाना होता था और वो कठिन पढ़ाई कर इसे हासिल करते भी थे। वे जब भी शिमला आते थे तो अपने घर यानी ऐवालॉज आना नहीं भूलते। इसके अलावा भी कई किस्से हैं। ऐवालॉज ने बहुत कुछ सिखाया। हालांकि अब मैं असल दुनिया में जी रहा हूं लेकिन रह-रह कर ऐवालॉज की दुनिया याद आती है। आए भी क्यों न? उस दुनिया में अव्वल तो कोई परेशानी नहीं होती थी... अगर होती भी तो वो चुटकियों में दूर हो जाया करती थी? ऐवालॉज में बिताए चार साल अब भी याद हैं और ताउम्र याद रहेंगें... सपनों को भूला थोड़े ना जाता है।

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