Monday, June 22, 2009

एक वो दिन थे, एक ये भी हैं...

सोमवार का दिन दो बड़ी ख़बरें...पहली ख़बर एक भारतीय अधिकारी को एक निजी कम्पनी ने नब्बे करोड़ सालाना की नौकरी दी......दूसरी बड़ी ख़बर एक निजी चैनल के निजी पत्रकार के पास अड़तालीस रूपए पाए गए.......इस पत्रकार के लिए ये अड़तालीस रूपए बेहद ख़ास थे.....इस धनराशि में तीन एक-एक रूपए के सिक्के भी थे.....वो पत्रकार तैयार होते वक्त बार-बार अपनी महंगी जिन्स में इन सिक्कों को टटोल रहा था...उसे बार-बार डर सता रहा था कि कहीं उसकी महंगी जिन्स इन सिक्कों को न निगल जाए....खैर पत्रकार साहब घर से निकल पड़े....पत्रकारिता जगत में एक धमाका करने......वैसे ये भी उनकी निजी राय है...क्योंकि हमने तो ऐसे किसी धमाके की आवाज़ अभी तक सुनी नहीं....खैर ये साहब जब घर से निकलते तो पता नहीं अपने आपको क्या समझते हैं...रात-रात भर अनाप-शनाप किताबें पढ़ते हैं और सुबह उस ज्ञान को अपने उपर वाले माले में लाद कर चल देते हैं.....इनकी जेब में आज अड़तालीस रूपए थे.....लेकिन फिर भी इनके मन में ये चल रहा था वित्त मंत्री प्रणबमुखर्जी अपने बजट में क्या ख़ास करेंगें.....तपती धूप ने इनके पसीने निकाल दिए थे.....और इनको ये भी पता था कि इनकी जेब से अड़तालीस रूपए भी निकलने वाले हैं.....लेकिन फिर भी बेखौफ...बेधड़क ये युवा जुझारू पत्रकार(ये उनकी निजी राय है) ऑटो में सवार हो गया....फिर शुरू हुआ....नयन मट्टका....लेकिन किसी हसीना से नहीं बल्कि ऑटो के मीटर से.....जैसे ही ऑटो का मीटर चालीस के आसपास पहुंचा तो पत्रकार साहब ने ऑटो रूकवाया और बड़ी अदब से पैंतालीस रूपए ऑटोचालक को दिए.....और फिर तपती धूप में चल दिए.....बारूद की फैक्ट्री की तरफ.....जहां वो रोज़ कोई बड़ा धमाका करने जाते हैं.....लेकिन बारूद की इस फैक्ट्री तक पहुंते-पहुंचते उनका सारा ज्ञान गायब सा हो गया था........लेकिन अभी भी उनकी जेब में एक-एक रूपए के तीन सिक्के थे...जो उन्होंने अपने पूजा घर से उठाए थे....और ऑफिस पहुंचते ही जब इन साहब को नब्बे करोड़ सालाना सैलरी वाले शख्स की खबर लिखनी पड़ी....तो आप समझ ही सकते हैं न उनपर क्या गुज़री होगी...

Friday, June 19, 2009

दो बहने, दोनों अधनंगी/ एक आधुनिका एक भीखमंगी

सबसे खतरनाक होता घर से ऑफिस और आफिस के घर जाना सबसे घतरनाक होता है जिन्दा सपनों का मर जाना.....ये पक्तियां पाश की हैं मेरी नहीं......खैर सपने तो भी जिन्दा हैं...मरे नहीं है....लेकिन घर से ऑफिस और ऑफिस से घर जाने का सफर शुरू हो चुका है....इस सफर के दौरान कई घटनाएं घटती हैं....उन्हीं में से एक के बारे में बताना चाहता हूं.....ये कहानी है दो बहनों की......यानी दो बहने दोनो अधनंगी एक आधुनिका एक भीख मंगी.......खैर जब कभी ऑटो से सफर करता हूं तो अक्सर रैड लाईट पर ऑटो रूकता है और और मैं अनायास ही ऑटो से सामने खड़ी गाड़ी....की तरफ झांकने लगता हूं.....हालांकि गाड़ियां बहुत होती हैं....लेकिन मेरी नज़र अक्सर उसी गाड़ी पर पड़ती है... जिसमें एक खूबसूरत सी दिखने वाली बला की बाला सवार रहती है.....बार बार उनको देखने का मन करता है....इसलिए नहीं कि वो बेहद खूबसूरत होती हैं.....बल्किन उनके पहनावे की वजह से...... ये बालाएं महज़ तन को ढकने के लिए और बेहद सोच समझ कर कम कपड़े पहनती हैं....हालांकि इनपर ये पहनावा खूब फबता भी है.... इसी बीच अक्सर ऑटो के पास उतने की कम कपड़ों में हाथ फैलाए कुछ बच्चियां आती हैं.... लेकिन ये अपनी मर्जी से इस तरह की कपड़े नहीं पहनती....बल्कि इन्हें मजूबरन ये पहनावा पहनना पड़ता है.....फिर शुरू होता है एक रूपया..दो रूपया दे दो ....ये बोलने का दौर.....लेकिन जब ये दौर चलता है तो बहुत गुस्सा आता है और मुंह से यही निकलता है.. कि कुछ नहीं है... चले जाओ......जबकि गाड़ी में बैठी बला की बाला को देखकर खाली जेब होते हुए भी ये कहने का मन नहीं करता... अब इसे विक्षिप्त मानसिकता कहूं..... मानव स्वभाव....या फिर मेरा देहाती पन.....जो भी हो लेकिन एक बात तो है..... वो दो बहने हीं है.....जिनमें से आधुनिका की तरफ को खूब ध्यान जाता है....लेकिन भीखमंगी की तरफ नज़र डालने का भी मन नहीं करता.....

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